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अफगानिस्तान, अफीम और तालिबान: GDP का 11% , पुलिस से ज्यादा पहरेदारों की सैलरी...नशे के नेटवर्क की पूरी कहानी

काबुलअफगानिस्तान की जमीन पर दशकों से सिर्फ आंतकवाद पलने का खतरा ही नहीं था, यहां दुनिया में सबसे ज्यादा अफीम की खेती भी हो रही थी। नशे की गिरफ्त से उसे आजाद कराने के लिए साल 2001 के बाद से अमेरिका, ब्रिटेन और अफगान सरकारों ने 20 ऐंटी-नार्कोटिक्स एजेंसियां चलाईं। एक मंत्रालय अफीम की खेती को बंद कराने से लेकर इसकी प्रोसेसिंग और तस्करी रोकने के लिए जुटा रहा। बावजूद इसके अफीम की खेती 1994 में 70 हजार एकड़े से 2017 में 3.3 लाख हेक्टेयर में फलने-फूलने लगी। तालिबान को इससे सबसे बड़ा फायदा हुआ जिसकी 10-40 करोड़ डॉलर की कमाई अफीम से आने लगी। अफगानिस्तान दुनिया में सबसे ज्यादा अफीम बनाता भी है और दुनियाभर में हेरोइन की 80% सप्लाई भी करता है। साल 2019 में UN ऑफिस ऑन ड्रग्स ऐंड क्राइम की एक रिपोर्ट में कहा गाय था कि अफीम के निर्यात से जुड़ीं गतिविधियों से 1-2 अरब डॉलर की कमाई होती थी जो अफगानिस्तान के GDP का 11% है। इस धंधे से 5 लाख लोग जुड़े थे। देश में अफीम की खेती का क्षेत्र-
साल क्षेत्र (हेक्टेयर में)
1994 70,000
2002 8000
2010 1,10,000
2017 3,30,000
2019 1,60,000
2020 2,20,000
कहां-कहां होती है सप्लाई? अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में से 22 में अफीम की खेती होती है जिनमें से 98% 6 दक्षिणी और दक्षिमपश्चिमी प्रांतों फराह, हेलमंद, कंधार, निमरोज, उरुजगान और जाबुल में होती है। वहीं, पूरी दुनिया में यहां से सप्लाई की जाती है जिनमें भारत, पाकिस्तान और चीन से लेकर रूस, अमेरिका, कनाडा तक शामिल हैं। पश्चिम, मध्य और दक्षिणपूर्व यूरोप हो या मध्य, दक्षिणपूर्व एशिया, खाड़ी देश, तुर्की, ईरान, अफ्रीका से लेकर ओशियानिया तक अफगानिस्तान से ही अफीम पहुंचाया जाता है। अफगानिस्तान पर नशे का शिकंजा-
नशा करने वालों की संख्या 25 लाख
नशे के लती आबादी का 2.75, 8-9 लाख
तालिबान की कमाई 10-40 करोड़ डॉलर (UNODC)
उत्पादन के हर चरण पर टैक्स 10%
कैसे चलता है व्यापार? इसका व्यापार बहुत होशियारी के साथ चलता है जहां फैक्ट्री और लैब लघु उद्योग की शक्ल में चलाए जाते हैं। इन्हें सिंडिकेट और आतंकी सरगना ही संभालते हैं। एक छोटे लैब में 10-20 लोग काम पर लगाए जाते हैं जिनमें पाकिस्तान या हेलमंद से बावर्ची और केमिस्ट्स लाए जाते हैं।
  • साल 2017 में अवन-ड्राई अफीम का उत्पादन 9000 टन था जो 1994 में 7000 टन ही था।
  • साल 2018 में सूखे के बावजूद निर्यात के लिए 486-736 टन हेरोइन तैयार किया गया।
  • फराह प्रांत के 300 लैब्स में 24 करोड़ डॉलर का सालाना क्रिस्टल मेथ उत्पागन होता है।
  • तालिबान को इस पर टैक्स में 4 अरब डॉलर मिल जाते हैं।
तालिबान की ताकत साल 2000 में तालिबान की सरकार ने अफीम की खेती पर बैन लगा दिया ताकि विदेशी रियायत मिल सके लेकिन इससे घर के अंदर ही असंतोष पैदा हो गया। बावजूद इसके आज तक अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांतों में पॉपी उत्पादन तालिबान की निगरानी में होता है। खेतों से लेकर लैब और तस्करी के रास्तों पर तालिबानी लड़ाकों का पहरा रहता है। यहां तक कि हर दिन खेतों पर नजर रखने के लिए 20 डॉलर दिए जाते थे जो अफगान पुलिस की कमाई से भी ज्यादा है। किस रास्ते तस्करी? मध्य एशिया और रूस धीरे-धीरे सिंथेटिक ड्रग्स की ओर मुड़ने लगे जिससे अफगानिस्तान से निर्यात के उत्तरी रास्ते की अहमियत कम होने लगी। साल 2008 में 10% मॉर्फीन और हेरोइन इसी रास्ते से जाता था लेकिन 2017 में यह 1% रह गया। अब इसे ईरान, पाकिस्तान से तुर्की होते हुए यूरोप भेजा जाता है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणपूर्व एशिया के लिए भारत से, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के लिए पाकिस्तान से निर्यात किया जाता है। क्यों फेल हो गई अमेरिकी की जंग? 20 साल में अमेरिका ने 9 अरब डॉलर पॉपी उत्पादन, हेरोइन प्रोसेसिंग और तस्करी को रोकने में लगे दिए लेकिन 2008 के बाद से अकेले साल 2019 में उत्पादन का सिर्फ 8% ही रोका जा सका। अमेरिका ने अपनी सारी ताकत तालिबान पर झोंक दी और उसी से निपटने में उलझा रहा जबकि नशे का कारोबर पनपता रहा। सबसे बड़ी चुनौती आई सरकारी अधिकारियों की तस्करों के साथ साठ-गांठ की शक्ल में। (Sources: Sigar, AREU (Kabul), UNODC, UN World Drug Report 2020, Centre for Afghan Studies, Al Jazeera, Tolonews.com, NYT, Media reports.)


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अफगानिस्तान, अफीम और तालिबान: GDP का 11% , पुलिस से ज्यादा पहरेदारों की सैलरी...नशे के नेटवर्क की पूरी कहानी Reviewed by SURFING CREATIONS on September 16, 2021 Rating: 5

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